नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन शनिवार को 'जन महाभियोग' का सांकेतिक कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर होने वाले इस कार्यक्रम में विपक्ष के कई दलों के नेता शामिल होंगे। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार इसकी अध्यक्षता करेंगी जबकि खड़गे प्रस्ताव पेश करेंगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समापन भाषण देंगे।
यह कार्यक्रम पहले शुक्रवार को होना था लेकिन दिल्ली में बारिश के कारण इसे एक दिन के लिए टाल दिया गया। राहुल गांधी ने शुक्रवार को विपक्षी नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी थी। कार्यक्रम का मकसद विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और 'वोट चोरी' के आरोपों को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध दर्ज कराना है।
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लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह जन महाभियोग चलाया जा सकता है? क्या विपक्ष के नेता किसी प्रस्ताव को पारित करके उन्हें पद से हटा सकते हैं? और अगर संसद में महाभियोग की प्रक्रिया होती है तो उसके लिए कितने सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है?
इन सवालों का जवाब समझने के लिए संविधान में दी गई व्यवस्था को जानना जरूरी है।
महाभियोग क्या होता है?
महाभियोग (Impeachment) किसी उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को गंभीर आरोपों के आधार पर पद से हटाने की एक संवैधानिक प्रक्रिया है। आम बोलचाल में इस शब्द का इस्तेमाल कई पदों के लिए किया जाता है लेकिन भारत के संविधान में हर पद के लिए एक जैसी प्रक्रिया नहीं है।
राष्ट्रपति को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 61 में महाभियोग की व्यवस्था है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया अलग संवैधानिक प्रावधानों के तहत होती है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 324(5) में विशेष सुरक्षा दी गई है। इसके तहत उन्हें उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
इसका मतलब है कि सरकार या संसद में साधारण बहुमत होने भर से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की क्या है संवैधानिक प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए केवल राजनीतिक विरोध या किसी प्रस्ताव के पारित होने से काम नहीं चलता। इसके लिए संविधान में तय प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
सबसे पहले लोकसभा या राज्यसभा में हटाने का औपचारिक नोटिस देना होता है। इस नोटिस पर कम से कम 100 लोकसभा सांसदों या 50 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
नोटिस मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति यह तय करते हैं कि उसे स्वीकार किया जाए या नहीं। वे उपलब्ध सामग्री और मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद नोटिस स्वीकार या खारिज कर सकते हैं।
यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ शामिल होता है।
यह समिति लगाए गए आरोपों की जांच करती है। संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है। गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संसद के सामने रखती है।
यदि समिति आरोपों को साबित नहीं मानती तो हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। लेकिन यदि आरोप साबित होते हैं, तो संसद में प्रस्ताव पर मतदान होता है।
दोनों सदनों में कितने सांसदों का समर्थन जरूरी?
यह इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी है।
इसके लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए। पहली, सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में होना चाहिए। दूसरी, मतदान में हिस्सा लेने वाले सांसदों में से कम से कम दो-तिहाई का समर्थन मिलना जरूरी है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी सदन में 300 सदस्य मतदान करते हैं, तो उनमें से कम से कम 200 का समर्थन चाहिए। इसके साथ कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन भी जरूरी होगा।
दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित होने के बाद उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
यानी इस प्रक्रिया में केवल सांसदों की संख्या नहीं बल्कि आरोपों की जांच और दोनों सदनों का विशेष बहुमत भी जरूरी है।
क्या विपक्ष पहले भी ज्ञानेश कुमार को हटाने की कोशिश कर चुका है?
हां। यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की है।
12 मार्च 2026 को विपक्षी सांसदों ने संसद के दोनों सदनों में उनके खिलाफ औपचारिक हटाने का नोटिस दिया था। लोकसभा में इस नोटिस पर 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर बताए गए थे।
इस नोटिस में SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पक्षपात और अनियमितताएं हुई हैं।
हालांकि 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने इन नोटिसों को स्वीकार नहीं किया। लोकसभा सचिवालय के आधिकारिक बुलेटिन में 130 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस को स्वीकार नहीं किए जाने की जानकारी दर्ज है।
इसका मतलब है कि पहले की औपचारिक संसदीय प्रक्रिया जांच समिति तक नहीं पहुंच सकी थी। अब विपक्ष का जन महाभियोग कार्यक्रम उसी विरोध को राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश है।
क्या खड़गे के आवास पर होने वाला जन महाभियोग ज्ञानेश कुमार को हटा सकता है?
इसका सीधा जवाब है- नहीं।
खड़गे के आवास पर होने वाला कार्यक्रम संसद की आधिकारिक कार्यवाही नहीं है। वहां मीरा कुमार की अध्यक्षता में प्रस्ताव रखा जाएगा, विपक्षी दलों के नेता अपनी बात रखेंगे और प्रस्ताव पारित किया जाएगा। लेकिन इसका कोई संवैधानिक या कानूनी प्रभाव नहीं होगा।
मीरा कुमार पूर्व लोकसभा अध्यक्ष जरूर हैं, लेकिन इस कार्यक्रम में उनकी भूमिका संसद के अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिका जैसी नहीं होगी। इसी तरह खड़गे और राहुल गांधी के भाषण या वहां मौजूद सांसदों का समर्थन संसद में होने वाले औपचारिक मतदान की जगह नहीं ले सकता।
इस कार्यक्रम से ज्ञानेश कुमार का पद नहीं जाएगा और न ही उनके अधिकारों पर कोई सीधा कानूनी असर पड़ेगा।
हां, विपक्ष इस आयोजन के जरिए अपने आरोपों को जनता के सामने रखने, विभिन्न राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने और चुनाव आयोग के कामकाज पर बहस को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकता है।
क्या कांग्रेस और INDIA गठबंधन का प्रयास सफल होने की उम्मीद है?
इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि सफलता से क्या मतलब लिया जा रहा है।
अगर विपक्ष का उद्देश्य एक बड़ा राजनीतिक विरोध दर्ज कराना, अपने दलों को एक मंच पर लाना और SIR के मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा में बनाए रखना है, तो यह कार्यक्रम उस दिशा में एक प्रयास है। इसका राजनीतिक असर इस बात से तय होगा कि कितने दल इसमें भाग लेते हैं, जनता के बीच इस मुद्दे को कितनी जगह मिलती है और आगे विपक्ष क्या कदम उठाता है।
लेकिन अगर उद्देश्य इस कार्यक्रम के जरिए ज्ञानेश कुमार को सीधे पद से हटाना है, तो ऐसा संभव नहीं है।
उन्हें हटाने के लिए संविधान में बताई गई औपचारिक प्रक्रिया ही अपनानी होगी। पहले नोटिस स्वीकार होना, आरोपों की जांच और फिर दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
इसलिए जन महाभियोग को मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की कानूनी कार्रवाई के बजाय विपक्ष के सांकेतिक विरोध और राजनीतिक दबाव बनाने के प्रयास के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब तथ्यों, जांच और संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर सामने आए। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उस पर जनता का भरोसा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।

